Sunday, March 29, 2020

पलायन पर नीतीश बाबू का कठोर रवैया

पलायन पर नीतीश बाबू का कठोर रवैया

कोरोना का वैश्विक बीमारी घोषित होने और 21 दिनों का देशव्यापी लॉकडाउन के बाद दिल्ली, पंजाब, हरियाणा, मुंबई और अन्य महानगरों से बिहार के लोगों का भारी संख्या में पलायन पर बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार ने जो रुख अपनाया है, वह बेहद कठोर है।



सुशासन बाबू नीतीश कुमार का कहना है कि जो लोग जहां हैं,
वही रहे, अगर उन्हें बसों से लाया गया तो इससे लॉकडान टुटेगा। साथ ही महामारी फैलने का खतरा है। ये बात तो बिल्कुल ठीक है। लेकिन नीतीश जी ने उन गरीब मजदूरों के बारे में एक बार भी ये नही सोचा कि वे लोग पलायन क्यों कर रहे हैं? हर कोई हालात से भलीभांती परिचित है कि गरीब मजदूरों , कामगारों की क्या समस्या है। गरीब कामगार मजदूर कोई शौक से पैदल घर नही जा रहे हैं। सबको पता है कि करीब 1000 से 1500 किलोमीटर की दूरी पैदल तय करना इतना आसान नही है लेकिन फिर भी वे अपने छोट छोट बच्चो को लेकर पैदल हाईवे से होकर आगे बढते जा रहे हैं। आप मजदूर कामगारों के दृष्टिककोण से हालात के बारे में सोचेंगे तो फिर आपको पता लगेगा कि वे लोग घर के लिए क्यों निकल पड़े। 


एक बात तो सबसे पहले लोगों के जहन में आता है कि नीतीश जी जो जहां है वहीं रहे का सिद्धांत की बात कर रहे हैं तो केंद्र सरकार ने चीन से सैकड़ों लोगों को भारत क्यों लायी। इटली से समते कई अन्य देशों से सैकड़ो लोगों को लाया गया। इन लोगों को लाने के लिए लाखों करोड़ों रुपये खर्च किये गये। अगर विदेशों से भारतीयो को लाया जा सकता है तो बिहारियों को दूसरे राज्य से बिहार क्यों नही लाया जा सकता है। उन्हें भी बिहार लाने के बाद उनके स्वाथ्य की जांच कर उन्हे अपने घर जाने दें। बिहार के लोगों के साथ भेदभाव क्यों किया जा रहा है। दूसरी तरफ उत्तर प्रदेश में वहां के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने बस भेजकर हाईवे पर पैदल लौट रहे लोगों को राहत दी।  
लेकिन नीतीश जी उन लोगों को अपने राज्य लाने में तत्परता नही दिखा रहे हैं।
हाइवे पर भी इस तरह का कोई व्यवस्था नही दिखा जिससे ये संदेश जाए कि बिहार सरकार अपने प्रदेश के लोग जो हाइवे पर फंसे हैं उनके लिए चिंतित है।

समाप्त 


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